मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ?

समीर भाई टिप्पणीशाह लालउड़नतश्तरीवाला कुछ लिखें, और हम कन्फ़्यूज़ियायें भी न ? ऎसा कम ही होता है.. ज़रूर कहीं कोई निहितार्थ रहा करता है । चतुर सुजान ऎंवेंई ही टाइम खोटी नहीं किया करते.. कुछेक जन ही ऎसे हैं, जिनकी पोस्ट मैं सहेज कर रख छोड़ता हूँ.. और  बाद  में उसे  फूँक फूँक  कर चौकन्नी निगाहों से पढ़ता हूँ । खैर.. उनकी विरुदावली  चिट्ठाचर्चा समेत कई ब्लाग पर आ चुकी है, सो यह मेरा मकसद भी नहीं है । आज वह अपने उच्च रक्तचाप को लेकर बिसूरते पाये गये.. साथ में मोटापे पर भी सैकड़ों लानते भेज डाले ।  मुझे लगा कि मैं एक मोटी सलाह दे ही डालूँ.. तीन ’री’ से बचें.. आराम में रहेंगे, हरी ( Hurry ) वरी ( Worry ) और करी ( Curry ) ! सोचा तो सही, पर  ठिठक गया कि वह उड़नतश्तरी के टेल से री उड़ाकर किस हैंगर में पार्क करेंगे ? मोटापे पर क्या कहता.. यह तो ग़ुज़रे ज़माने की मेरी भी आपबीती रही है, कभी लिखा भी था !  फिर इसी को समेटने की इच्छा तो है..पर, टैम कहाँ है  रे ?

image09मेडिकल कालेज़ में मेरे सहपाठी मित्र खुर्ज़ा के एक शर्मा जी हुआ करते थे.. बड़े मौज़ी और… बड़े ही घिस्सू ! अगर वह केला ले रहे होते, तो पूछते केले कितने के ? हम छात्र लोग यूँ तो फल-वल पर पैसे जाया नहीं किया करते थे, दर्ज़न किलो लेना तो दूर की बात !  फलवाले का ज़वाब," एक रूपये का एक !" अमें इत्ते में तो कैप्सटन की डिब्बी आ जायेगी, ठीक बताओ.. पचास पैसे में दोगे ?  फलवाला पिंड छुड़ाने को आज़िज़ी से तमक पड़ता, " पचास पैसे में तो छिल्का भी न मिलेगा ।" शर्माजी बिना विचलित हुये तपाक से कहते, " ठीक है, यह ले पचास पैसे और केला दे दे, छिल्का तो भाई तू ही रख लीज़ो ।" फिर स्वयँ ही बेशर्म हँसी का लबादा ओढ़ लेते…" हा हा हा.. खी खी.. ऊहू ऊ ! " आज उनको याद करते हुये यह आधे रेट की घटे दरों पर बेशर्म पोस्ट दे रहा हूँ, हा हा हा.. खी खी.. ऊहू ऊ ! यूँ तो.. किसी चुके हुये रियासत के शस्त्रागार सरीखे अपने ब्लाग आरकाइव से निकाल कर ऎसी  पुरानी  पोस्टें  बार बार भाँजने की अपनी आदत तो है नहीं, फिर भी.. उन दिनों मैं परेशान रहा करता था कि मैं मोटा क्यूँ हूँ ? बाद में तो ख़ैर .. उसका ज़वाब भी मिल गया ! उत्सुकता हो रही है ? पर वह सब बातें बाद में

kk33लेकिन  बिरादर, उन दिनों होंठों पर बस यही रहा करता था, “ मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ? मैं मोटा हूँ हूँ..  मैं हीं हीं हूँ हूँ..  हैं होंटा हूँ हूँऽऽ, जब ऋतिक रोशन जैसी फ़िगर न रही, तो खिसियाहट मिटाने को यही पैरोडी बाथरूम में घुसते हुये, लोगों को जोर से सुनाते हुए, गुनगुना कर काम चलाना पड़ता था.. हैं होंटा हूँ हूँऽऽ  । हँसिये मत भाई, सही में इसे मैं काम चलाना ही कहूँगा, मज़बूरी थी । अपने चाणक्य बाबा मलेच्छ भाषा में कह गये हैं,  Offence is the best Defence ! सो उनका अनुसरण करते हुये, दूसरों के हँसने से पहले  स्वयं ही गाने लगो । अब अगला भला क्या खाकर किसी छिनरो का भतार छीनेगा ?  ग़र छीन सकते हों, तो पहले इनका भी कुछ छीन कर दिखाओ ? मैं मोटा क्यों, हूँह !

यह मैं नहीं..  मैन्यूल है, बोले  तो बेचारा मोटापे  का  ज़हे-नसीब फिज़िशियन  सैम्पल !

सौजन्य: यू-ट्यूब इंडिया एवँ टाइम्स आनलाइन डाट काम

manuel-2 अरे, कोई पूछ भी लो कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ ? छोड़ो, मैं स्वयं ही बेशर्म नेताओं की तरह अपना स्पष्टीकरण दिये देता हूँ । दरअसल पिछले दिनों मेरा वज़न अचानक बढ़्ने लग पड़ा । 68 किलो के सदाबहार देवानंद, शनैः शनैः उत्सव के अमज़द खान की तरह होने लगा, कोई कहता कि आप पचपन के नहीं लगते तो मैं लक्का कबूतर सा गरदन नचा कर कहता, " यह तो पचपन का बचपन है, यार ! "  किंतु पता नहीं कौन सी टेलीपैथी हुयी कि जिस दिन मेरी  पंडिताइन ने श्री ज्ञानदत्त जी का फोटू देख कर कहा,” अरे, यह तो तुम्हारे उम्र के ही  हैं ? बस थोड़े हेल्दी हैं ! खासे भोले लगते हैं !”  बस्स यारों, समझो उसी दिन मेरी फ़ुरसत हो गयी । दूसरे का ख़सम.. ठहरा भोला, और अपना निजी पति हुआ तो भोंदू ? उन दिनों हमारी गृहस्थी में, ज्ञानदत्त जी का बोलबाला था..  वह मेरी पोस्टों के सोलो शोमैन यानि टिप्पणीकार थे । आख़िर यह ज़नानियाँ दूसरों के पति से अपने की तुलना ही क्यों किया करती हैं ? उसके वो हमारे इनसे मोटे हैं, हमारे ये उ्सके आदमी से तो लाखगुना अच्छे हैं, गोया आदमी न हो गया नये फ़ैशन का कपड़ा होगया । इतराती हुई बलखाती हुई बोलेंगी,” बहुत जतन किये हैं, इन हाथों नें इनकी ऎसी की तैसी देखभाल करने में ! रचना जी आप यह पोस्ट पढ़ रही हैं, कुछ ठीक ठाक माहौल लग रहा है, यहाँ ? हाँ तो, जरा हमारे पाठकों को यह बतायेंगी कि ऎसा क्यों सोचा जाता है ? और यह कि महिलाओं की गोष्ठियों में पतियों का तुलनात्मक अध्ययन/ परिचर्चा ही क्यों अनिवार्य हुआ करती है ? हाँ तो ….

मैं चिढ़ जाता हूँ, ऎसी तुलनाओं से ! अरे, तुम तो दिन में दस बार, जब मर्ज़ी आया पति को धोकर टाँग देती हो । चलो, इसे मुहब्बत करने का सितम मान लेते हैं ( और चारा भी क्या है ? अपुन का चारा -पानी डिपार्टमेन्ट भी तो इन्हीं के पास ठहरा  ), सो सब सिर आँखों मंज़ूर ! लेकिन क्या ज़रूरी है, गैरपुरुषों पर टीका टिप्पणी करना ? क्यों जताता हैं, इन चोखेरवालियों का पोस्ट कांटेन्ट, कि आपको सर्फ़ एक्सेल  से सहेज़ना है, या घड़ी डिटरज़ेन्ट से रगड़े जाने की ज़रूरत है ?

सो, अपने श्रीमान गुरु जी के मोटा कहे जाने पर मेरा क्लेश क्रोध बन कर, अपनी  नवी नवी  कलहप्रिया  पर  फूट  न सका .. फलतः  अपने गुरुवर ने शाप-वेव्स को ट्राँसमिट कर दिया हो ।  ।  वैशाख के गदहे की तरह मैं दिनोंदिन अनायास  मोटा होने लगा । मित्रों की भ्रुकुटियाँ व्यंगात्मक तंज़ में चौड़ी होने लगीं । मैं बेचारा क्या कहता, दस वर्षों से तो मेन्टेन कर रहा हूँ । दही, मट्ठा, छाछ, सत्तू का शरबत, ढेरों फल व ब्लैक काफ़ी पर दिन गुज़रता है, रात में भोजन के नाम पर चिड़िया का चुग्गा व सवासेर सब्ज़ी ! बीच में यदि कभी ज़रूरत हुयी तो गुड़-चूड़ा या लाई-चना से खिसिया कर तृप्त हो लेता हूँ, अब मोटा हो रहा हूँ तो क्या प्राण तज दूँ ?

सलाहें आने लगीं… नियति मुस्कुराने लगी… पंडिताइन गुर्राने लगीं… " मार्निंग वाक पर जाओ, कल से ! " मैं जनम जन्माँतर का निशाचर, एकदम काँप गया । ‘हाय भगवान, मैंने तो कितनों को अब तक टहला दिया, अब तुम मुझे टहलाने जा रहे हो ?’ अपनी फ़ीस ज़ेब के हवाले कर, मरीज़ों को टहलाना तो मेरे पेशे की ज़रूरत है । न टहलाऊँ तो बाबा रामदेव उनको हँका ले जायेंगे । अब तुम मुझे तो न टहलाओ, दीनबंधु दीनानाथ ! यह भला क्यों सुनें ? वैसे भी हाइटेक बाबाओं ने उनको फ़ुसला लिया है, वह वहीं सुगंधित वातावरण में डोलते हैं । लिहाज़ा टहलने की सज़ा की तारीख़ तक तय हो गयी । पहली सुबह, एलार्म बज पड़ा । माई कसम, अपना न होता तो, बाहर फेंक देता । नहीं फेंक पाया..

और वह मेरे कानों में किर्राती रही । किर्राओ, जितना किर्राना है, हम न उठेंगे । पंडिताइन का प्रवेश..,” उठो यार, पहले दिन ही मक्कारी कर रहे हो ?”  तुम भी चलो, मैंने शो करवाना चाहा । नहीं नहीं तुम जाओ, मुझे कितना काम है, वह कौन करेगा ? महरी आने वाली होगी, उसके लिये चाय कौन बनायेगा ? तुम जाओ.. तुम्हें ज़्यादा ज़रूरी है । कहीं कुछ हो हवा गया, तो मैं क्या करूँगी ?  लो जी, मेरे स्वास्थ्य में भी इनका एक अर्थशास्त्र छिपा है । मज़बूरी का दूसरा नाम मिडिल क्लास आदमी है, देख लीजिये यहाँ ! “चल्लो..उट्ठो, दिन भर बैठे रहते हो ।” क्लिनिक, कार, कम्प्यूटर भला खड़े होकर भी चलाई जा सकती है ? इस नादान को कौन समझाये ? इतने में एकतरफ़ा फाइनल वर्डिक्ट भी आ गया,” जाओ कम से कम ओवरब्रिज़ तक तो हो आओ ।”  मैं पड़ा पड़ा दार्शनिक हो गया, ‘ नारी तेरे रूप अनेक ‘ रात में तो प्राणप्यारी लग रही थीं, अब इस समय क्यों जलवा-ए- प्राणहत्यारी  बिखेर रही हो ? कसम दे देकर एक कटोरी एक्स्ट्रा खीर दी थी, अब पद्दी पदाने पर आमदा ! खैर, जो न होना चाहिये था, वह होकर रहा । मुझे घर से निकलना ही पड़ा । धकियाया गया, पैर घसीटते हुये बेआबरू से चल पड़े, जायें तो जायें कहाँ ?
अज़ब गज़ब नज़ारा, लगता था पूरे शहर के बेडौल डील डौल वालों की कोई रैली चल रही हो । उचकते, भचकते सभी भागे जा रहे हैं, उत्तर को ! नज़रें चुराते हुये हम भी शामिल हो लिये, इस अनोखे कारवाँ में । कुछ शिकारी निगाहों ने मुझे ताड़ लिया, पीछे लग लिये,  डाक्टर साहब, इस डायबिटीज़ में बेल का शरबत लेना चाहिये.. अच्छा अच्छा.. और जी वह हरा वाला  कद्दू ? अबे कद्दू तो तू खुद ही लग रहा है, अब तू किस कद्दू को खायेगा ? पर बोला नहीं,क़ोफ़्त होने लगी

सुबह की अपनी अच्छी खासी तरो-ताज़ा खोपड़ी कई जगह चटवाते, नुचवाते, सरकारें  बनवाते  गिरवाते , अंत में उनके  हिसाब से मंत्रिमंडल में फेरबदल करवा कर ही घर लौटा । पंडिताइन के आशा के विपरीत, मैं  चहकते   हुये  घर  में दाखिल हुआ । पंडिताइन भौंचक, फिर सहसा पैंतरा बदल, वह भी राग हर्षित में संगत देने लगीं, देखा !  एक ही दिन में कितना फ़र्क़ पड़ गया । साँस अँदर जाने में जैसे अकड़ रही  है, ये हैं कि " हुँह, कीतना फरक पर गिआ ? "  बोला कुछ नहीं, कुछ न बोलो तो बीबी की परेशानी का कोई ओर-छोर नहीं मिलता ( आप भी यह मंतर आज मुझसे मोफ़त में लेलो ), मैं तो अपनी अन्य उपलब्धियों पर झूम रहा था, शहर के बहुत सारे सहतोंदू भाई एक साथ, इस अवसर पर मिले …  किबला तोंदू तो मैं भी हूँ, तभी तो इन गणमान्यों को सहतोंदू कह रहा हूँ । इन सहतोंदुओं में, अपनी गिरफ़्त में आने वाले कई को चिन्हित किया, और उनसे अतिप्रेम से मिला । अब यह समझो कि प्रैक्टिस में, कुछ नहीं तो 15% का इज़ाफ़ा तो कहीं गया नहीं है । इतना पब्लिक रिलेशनशिप और नेटवर्किंग तो  ब्लागर से सीख ही लिया है !

मुझसे कोई उचित रिस्पांस न पाकर पंडिताइन अपने में व्यस्त हो गयीं । अंदर शायद किसी से फोन पर बात हो रही थी, “ हाँ हाँ, हाँ हाँ हैं ! हाँ घर में ही हैं, अभी अभी वाक कर के लौटे हैं, थोड़ा (?) रिलैक्स हो रहे हैं । मैं बता दूँगी, वह 8 बजे तक ख़ुद ही बात कर लेंगे । जी अच्छा, जी अच्छा, नमस्कार !” अरे ! यह तो एक दूसरे तरह की उपलब्धि हाथ में आ गयी, ‘ अभी अभी वाक कर के लौटे हैं ‘ इतना बोलने में ही उनका दर्प इस कदर टपक रहा था कि मानो मेरे जैसी शूरता शायद ही किसी मर्द के बच्चे ने दिखायी हो । अब तो शाम तक मेरा पूरा समाज़, मेरी  इस  वाकिंग  मर्दानगी  से वाक़िफ़ हो जायेगा, बड़ा तेज चैनल है इनका । सीना चौड़ा कर के चाय के इंतज़ार में बैठ गया । लेकिन यार, यह  तो जीत रही हैं …  अब  क्या किया जाये, भला ?

  आगमन पंडिताइन का, और सुनाओ, कैसी रही आज की वाक ?  मेरा प्रत्युत्तर “ अरे एकदम मूड फ़्रेश होगया । अंबेदकर वाले मोड़ पर ही मिसेज़ खन्ना मिल गयीं, ग़ज़्ज़ब है भाई.. ज्यों की त्यों रक्खी हैं, पिछले दस साल से ! एकदम छोकरी लगती है, यह मंजुलवा ! बहुत देर तक उससे बातें होती रहीं, कहने लगीं कि वह अपने फ़िगर के लिये कुछ भी कर सकती हैं, बुरा न मानो तुम तो उसकी ताई लगने लगी हो । लौटते में वह गर्ग साहब की वाइफ़, अरे.. वो आईटीआई वाले, जो मंटू की शादी में झूम झूम कर नाच रही थी, हाँ वही मिली । उस दिन तो मैं भी चक्कर खा गया कि इस उम्र में भी यह लचक, भाई कमाल की चीज है, उसकी कमर….कभी उसको चूड़ीदार में देखा है ? आज वह चूड़ीदार में थी !

मेरी बात पूरी ही कहाँ होने पायी, पंडिताइन के चेहरे से धुँआ उड़ता दिखायी देने लगा, साथ ही कुछ ज़नानी टाइप बारूद की गंध भी … । अचानक फट ही तो पड़ीं, कब बंद होगी तुम्हारी लम्पटई ? बेटी जवान हो रही है, और तुम सुबह सुबह अपने औरतबाजी के कारनामे मुझे सुना सुना कर रस ले रहे हो । हद हो गयी बेशर्मी की !  हाँफते हुये आगे बढ़ते बढ़ते, पलट कर फिर एक वार किया,  आख़िर कब सुधरोगे ? सुधरोगे भी कि नहीं ? कोई ज़रूरत नहीं है, कल से कहीं जाने की ! जो करना हो घर में करो । चलो अमर कुमार, अपना काम तो बन गया । अब इनसे पूछूँगा,’ घर में करना क्या है, एक्सरसाइज़ या औरतबाजी ?  काँटे से काँटा तो निकल गया, लेकिन मेरा बहत्तर किलो किस घाट लगेगा ? खैर, निदान मिल गया ।  आख़िर  बेमन  की  डाक्टरी  पढ़ाई   का  कुछ  बचा खुचा हुआ  ही  काम आया ।

संभावित कारणों की पड़ताल में, थायरायड महाशय दोषी पाये गये । टेस्ट में कामचोरी करते रंगेहाथों पकड़े गये । यानि हाइपोथायराडिज़्म ! बस एक गोली का सवाल है, वह ले रहा हूँ । इस पोस्ट की अँतिम लाइन लिखने तक वज़न 68.5 कि०ग्रा० है ! बाकी तफ़सील बाद में.. अभी टैम नहीं रहा, सो, इतना ही लिख सका । तो मित्रों,  जैसे  मेरे  दिन  बहुरे,  आप लोग दुआ करें कि,  वैसे ही समीर भाई के भी बहुरें । इन्हीं सद्कामनाओं के साथ, मेरा नमस्कार !

 
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17 Responses to “मैं मोटा क्यों हूँ…मैं मोटा क्यूँ हूँ ?”

  1. AlbelaKhatri.com Says:

    ACHHA LAGA……………..ANAND BHI AAYANAYAAPAN BHI MILA………———–BADHAAI !

  2. अनूप शुक्ल Says:

    पत्नियों के लिये पति एक आइटम होता है। अपने आइटम को अपने अनुसार रखने उनका अधिकार है। बकिया दुबले बनने के लिये बहुत दुबला होना भी ठीक नहीं है न जी।

  3. बी एस पाबला Says:

    यह भी खूब रही :-)

  4. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi Says:

    दुबारा पढ़ना पहले से अच्छा लगा। बेचारा थॉयरॉयड पकड़ा गया। वरना न जाने क्या क्या गुल खिलाता। लगे हाथों हमें भी चैक करवा ही लेना चाहिए।

  5. cmpershad Says:

    भई, डॊक्टर की सलाह है तो मानना ही पडेगा समीर जी को। आखिर डॊक्टर के सामने सभी कठपुतली ही तो हैं:) बोल री कठपुतली….इब इस री को कहाँ रखें:-)

  6. विवेक सिंह Says:

    पहले इस बात की जाँच होगी कि लेखक क्या वास्तव में मोटा है ? यदि यह सही पाया गया तो कारणों घुसा जायेगा !

  7. Udan Tashtari Says:

    का महाराज, मरवा दिहिन!!!हमारी पंडिताईन भी पढ़ डाली हैं ये सब. हम पढ़वाये इसलिए कि जोर जबरदस्ती रुक जायेगी मिसेस खन्ना वगैरह का सुन कर मगर यहाँ तो पैतरा ही बदल गया है ..कल से साथ जाया करेंगी उहो टहलने. बताओ भला, फिल टहले का कौनो फायदा है भई?सलाह तो टिकिया बना कर धर ही लिए हैं और ये फोटो सबसे उपर वाला लिए जा रहे हैं आज की अपनी पोस्ट पर लगाने.अभी मैडेम बाजार निकलीं हैं तो फटाफट एक दो पोस्ट पढ़ लेता हूँ. अपनी चढ़ा देता हूँ..फिर चद्दर ओढ़ कर लेट लूँगा. :) मस्त रहा!!

  8. कुश Says:

    हमको तो बाइज्जत जिम ज्वाइन करवा दिया गया है. लाख कह दिया कि वहा पर हेमा मालिनी टाइप की कन्याये आती है.. पर उन्हें हम पर पूरा भरोसा है कि हम में इतनी हिम्मत नहीं कि जाकर उनसे दो बात कर ले.. इसलिए रगड़ रहे है खुद को.. कोच को कहते है कम नहीं हो रह तो ससूर कहता है जब बढ़ने में इत टाईम लिया था तो कम होने में भी तो टाइम लगेगा.. पर उसको कैसे बताऊ ? कि.. टैम कहाँ है रे ?आपने तो पीछा छुडा लिया.. पण अपुन किधर कु जाए..

  9. डा. अमर कुमार Says:

    @ Bhai Kush :अभी से उट्ठक-बैठक शुरु ? तुमने स्वयँ तो ही लिखा है.." वहा पर हेमा मालिनी टाइप की कन्याये आती है.. पर उन्हें हम पर पूरा भरोसा है "मैं इसे सँशोधित किये देता हूँ, कि.." वहा पर हेमा मालिनी टाइप की कन्याये आती है.. पर उन्हें हम पर पूरा भरोसा है कि यह हैं, बेनाइन भाई-कुश ! "यह उन्हें दिखला दीजो, अब तो खुश ?

  10. ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey Says:

    मेरे साथ तो पत्नीजी बाकायदा जाती हैं। रास्ता और कायदा भूलने का चांस ही नहीं है। खन्नाइन और गर्गाइन की फोटो लगाइये, तभी कुछ सार्थक टिप्पणी कर पायेंगे! :-)

  11. anupam mishra Says:

    इसको कहते हैं…पेट का लंबा चौड़ा घाट, कि जिस पर बिछा लीजिए खाट…हाय रे मध्यप्रदेश तेरी अजब कहानी

  12. Vivek Rastogi Says:

    धन्यवाद मोटे लोगों का पक्ष रखने के लिये, पूरा लेख धर्मपत्नि को पढ़वा दिये हैं जिससे कि हमें कुछ समझाना न पढ़े।

  13. समयचक्र : महेन्द्र मिश्र Says:

    वाह आपने तो बहुत कुछ लपेट समेट लिया है . पढ़कर आनंद आ गया . आभार.

  14. Arvind Mishra Says:

    हे मुझे भी आज ऐसे ही एक सलाह दी गयी है आर्ट आफ लिविंग ज्वाईन करने की -यह हो क्या रहा है ?

  15. रौशन Says:

    वाह बस मुस्कुराते ही रहना पडा पढ़ते हुए हम भी किसी टहलाने वाले के इंतज़ार में मोटे हुए जा रहे हैं

  16. डॉ .अनुराग Says:

    पहले दो महानुभावो को वाया चिटठा चर्चा से बांच कर आपका नंबर लगा…ओर अफ़सोस हुआ की पहले क्यों नहीं बांची …एक दम झक्कास पोस्ट है ….उन दोनों से ज्यादा नंबर आपके …..हमें लगा आप की फ्लेश्बेक में कुछ मजेदार किस्से केले के बहाने ही मिल जायेगे पर आपने बीच में ही स्टोरी को यु टार्न दे दिया….खैर अपनी सेहत का राज राज ही रखिये …..@कुश से कहियेगा हेमा मालिनी टाइप लड़किया न लिखे .हमारे मोहल्ले के एक भाई साहब उनके तगडे फेन है …ऐसे ओर भी कई है ..पुराने ज़माने की हिरोईन ऐसा ही होना मांगता …वैजयंती माला …माला सिन्हा ..

  17. अनूप शुक्ल Says:

    आज दुबारा बांच लिया आपके झांसे में आकर।

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